गुलाम वंश कब से कब तक रहा? - gulaam vansh kab se kab tak raha?

सन् 1210 ईसवी में चौगान (पोलो) खेलते हुए घोड़े से गिरकर ऐबक की मृत्यु हुई । इसे लाहौर में दफनाया गया ।

इल्तुतमिश (1210-36 ई.)

कुतुबुद्दीन ऐबक की अकस्माति मृत्यु के कारण अपने किसी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर सका था । इस कारण लाहौर के तुर्क अधिकारियों ने ऐबक के विवादित पुत्र आरामशाह को लाहौर की गद्दी पर बैठाया , परंतु दिल्ली के तुर्की सरदारों एवं नागरिकों के विरोध के फलस्वरूप ऐबक के दामाद इल्तुतमिश को राज्य की गद्दी पर बैठा दिया गया ।

🔸इल्तुतमिश तुर्किस्तान का इल्बरी तुर्क था , जो ऐबक का गुलाम एवं दामाद था । ऐबक की मृत्यु के समय वह बदायूँ का गवर्नर था ।

🔸इसे मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संगठनकर्ता माना जाता है ।

🔸इल्तुतमिश लाहौर से राजधानी को स्थानांतरित करके दिल्ली लाया । इसने हौज-ए-सुल्तानी का निर्माण देहली- ए-कुहना के निकट कराया था ।

🔸उसने मिनहाजुद्दीन सिराज तथा मलिक ताजुद्दीन को संरक्षण प्रदान किया ।

🔸सन् 1226 ईसवी में इल्तुतमिश ने रणथम्भौर को जीता ।

🔸इल्तुतमिश पहला शासक था, जिसने 1229 ई. में बगदाद के खलीफा से सुल्तान पद की वैधानिक स्वीकृति प्राप्त की ।

🔸उसने कुतुबमीनार के निर्माण को पूर्ण करवाया ।

🔸उसने सबसे पहले शुद्ध अरबी सिक्के जारी किए । सल्तन युग के दो महत्वपूर्ण सिक्के चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल उसी ने आरंभ किए ।

🔸इल्तुतमिश ने इक्ता प्रणाली चलाई और सुल्तान की सेना की निर्माण का विचार दिल्ली सल्तनत को प्रदान किया ।

🔸उसने चालीस गुलाम सुधारों का संगठन बनाया, जो तुर्कान- ए- चिहलगानी के नाम से जाना गया ।

🔸इसने सबसे पहले दिल्ली में अमीरों का दमन किया।

रजिया सुल्तान ( 1236-40 ई.)

इल्तुतमिश के बाद उसका पुत्र रूकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठा, वह एक अयोग्य शासक था । इसके अल्पकालीन शासन पर उसकी माँ शाह तुरकान छाई रही ।

शाह तुरकान के अवांछित प्रभाव से परेशान होकर तुर्की अमीरों ने रूकनुद्दीन को हटाकर रजिया को सिंहासन पर आसीन किया । इस प्रकार रजिया बेगम प्रथम मुस्लिम महिला थी, जिसने शासन की बागडोर सँभाली ।

रजिया ने पर्दाप्रथा का त्यागकर तथा पुरुषों की तरह चोगा (काबा) एवं कुलाह (टोपी) पहनकर राजदरबार में खुले मुँह से जाने लगी ।

कुतबुद्दीन ऐबक के बाद उसका पुत्र आरामशाह सुल्तान बना, परन्तु वह अयोग्य शासक था। कुछ समय तक शासन करने के बाद बदायूं के गवर्नर शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने आरामशाह को पद से हटाया और स्वयं सुल्तान बन गया। इल्तुतमिश, कुतबुद्दीन ऐबक का दास व दामाद था। इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उसने गुलाम वंश के साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया। उसने मुल्तान और बंगाल पर विजय प्राप्त की थी।

प्रशासनिक समस्याएं

  • इल्तुतमिश कुशल शासक था, उसने चंगेज़ खां के आक्रमण को अपनी राजनीतिक कुशलता से टाल दिया था। इसने साम्राज्य में उत्पन्न विभिन्न विद्रोह का दमन किया। उसने रणथम्भौर पर विजय प्राप्त की थी। इल्तुतमिश ने यिल्दोज़ और नसीरुद्दीन क़बाचा को पराजित किया था।
  • इल्तुतमिश ने अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया, उसने अपनी सेना को संगठित किया। उसने साम्राज्य का विभाजन व्यवस्थित रूप में किया। इल्तुतमिश ने मुद्रा प्रणाली में सुधार करते हुए चांदी के टंका और ताम्बे के जीतल को जारी किया। इन सिक्कों पर टकसाल का नाम भी अंकित किया जाता था। ग्वालियर विजय के बाद उसने सिक्कों पर अपनी पुत्री रज़िया का नाम अंकित करवाया। उसने अरबी सिक्के जारी किये, वह शुद्ध अरबी सिक्के जारी करने वाला पहला तुर्क सुल्तान था।
  • इल्तुतमिश ने भारत में इक्ता प्रणाली की शुरुआत की, यह प्रणाली इस्लामिक क्षेत्रों में प्रचलन में थी। इक्ता प्रणाली के बारे में ‘सियासतनामा’ नामक पुस्तक में उल्लेख किया गया है। इल्तुतमिश ने दोआब में दो हज़ार सैनिक नियुक्त करके दोआब को अपने अधीन किया।
  • इल्तुतमिश ने न्याय व्यवस्था में भी सुधार किये, उसने नगरों में काजी और अमीर-ए-दाद को नियुक्त किया। प्रशासनिक सुगमता के लिए उसने तुर्क सरदारों के एक समूह चालीसा अथवा तुर्कान-ए-चहलगानी की स्थापना की। धीरे-धीरे चालीसा की शक्तियों में वृद्धि हुई और बाद में सुल्तानों की नियुक्ति तथा उनको पदस्थ करने में चालीसा की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

इक्ता

इक्ता प्रणाली में इक्तेदार द्वारा कर संगृहीत किया जाता था। यह राशी भू-स्वामी की सेना के लिए एकत्रित की जाती थी। इसका एक हिस्सा सुल्तान को दिया जाता था। जिस व्यक्ति को इक्ता दिया जाता था, वह सुल्तान की सहायता के लिए सेना रखता है, यह सेना आवश्यकता पड़ने पर सुल्तान की सहायता करती थी। इक्तादार को किसी दूसरे स्थान पर भी नियुक्त किया जा सकता था। इस व्यवस्था से सुल्तान को विशाल सेना को कुशलतापूर्वक रखने में सहायता मिलती थी।

गुलाम वंश का इतिहास [ 1206-1290 ] :- साथियों इस लेख के माध्यम से गुलाम वंश के संस्थापक कौन थे ( Gulam Vansh ke sansthapak kaun the ), गुलाम वंश का अंतिम शासक कौन था ( Gulam Vansh ka antim shasak kaun tha ), गुलाम वंश की स्थापना ( Gulam Vansh ki sthapna ), कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम कौन था और गुलाम वंश से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न व गुलाम वंश के पतन के कारण और गुलाम वंश में कितने शासक हुए ( Gulam Vansh mein kitne shasak hue ) तथा दिल्ली सल्तनत का पहला गुलाम राजा कौन था आदि के बारे में इस लेख के माध्यम से जानेंगे !

गुलाम वंश का इतिहास


सबसे पहले आपको दिल्ली सल्तनत ( 1206-1526 ) के इतिहास के बारे में थोड़ी सी जानकारी होनी चाहिए चलिए हम आपको बताते हैं दिल्ली सल्तनत के पांच राज्य वंश कौन कौन थे आइए देखते हैं !

दिल्ली सल्तनत [ 1206-1526]

मोहम्मद गौरी की मृत्यु व बाबर के आने से पहले का समय दिल्ली सल्तनत कहलाता है।इस समय के अधिकांश शासक तुर्क व उनकी दरबारी भाषा फारसी थी।

दिल्ली सल्तनत ने 5 राजवंशों पर क्रमशः शासन किया :–

(1) गुलाम वंश

(2) खिलजी वंश

(3) तुगलक वंश

(4) सय्यद वंश

(5) लोदी वंश

दिल्ली सल्तनत का प्रथम राजवंश गुलाम व अंतिम लोदी था। इनमें सर्वाधिक समय शासन तुगलक वंश ने व सबसे कम समय शासन खिलजी वंश ने किया था।

FAQ

गुलाम वंश का संस्थापक कौन था?

ans. कुतुबुद्दीन ऐबक

गुलाम वंश कब से कब तक रहा ?

ans. 1206-1290

गुलाम वंश का अंतिम शासक कौन था ?

ans. समसुद्दीन क़ैयूमर्स

गुलाम वंश में कितने शासक थे ?

ans. 11

गुलाम वंश का दूसरा नाम क्या था ?

मामलुक वंश या दास वंश

गुलाम वंश की आय का मुख्य स्रोत क्या था ?

ans. भू राजस्व

गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक किसे कहा जाता है ?

ans. इल्तुतमिश को

गुलाम वंश का तीसरा शासक कौन था ?

ans. इल्तुतमिश ( 1211-1236 )

इल्तुतमिश का उत्तराधिकारी कौन था?

ans. उसकी पुत्री रजिया

इल्तुतमिश के कितने बेटे थे?

ans. 4

गुलाम वंश का इतिहास [1206-1290]

इसे दास वंश या मामलुक वंश भी कहते हैं। मामलुक वे संतान होती है जो स्वतंत्र मां-बाप से पैदा होकर किसी भी अधिनता स्वीकार कर ले।

मामलुक वंश / गुलाम वंश के शासकों का क्रम निम्न है:–

  1. कुतुब-उद-दीन ऐबक (1206-1210)
  2. आरामशाह (1210-1211)
  3. शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211-1236)
  4. रुक्नुद्दीन फिरोजशाह (1236)
  5. रजिया सुल्तान (1236-1240)
  6. मुईज़ुद्दीन बहरामशाह (1240-1242)
  7. अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-1246)
  8. नासिरुद्दीन महमूद शाह (1246-1265)
  9. गयासुद्दीन बलबन (1265-1287)
  10. अज़ुद्दीन कैकुबाद (1287-1290
  11. क़ैयूमर्स (1290)

कुतुबुद्दीन ऐबक :- [1206-1210]

  • ये मोहम्मद गौरी के गुलाम व सेनापति थे। इन्हें दिल्ली सल्तनत व गुलाम वंश का संस्थापक कहा जाता है। ऐबक शब्द का शाब्दिक अर्थ -“चंद्रमा का स्वामी” होता है।
  • इन्होंने सुल्तान की उपाधि ग्रहण नहीं की इनके द्वारा नायब व सिपहेसालार की उपाधि ली गई। इन्होने अपनी राजधानी रावी नदी के तट पर स्थित लाहौर को बनाया।
  • दानी स्वभाव के कारण इन्हें लाख बख्स बादशाह या हातिम- दितीया कहा जाता है। 1210 ई.मे चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर इनकी मृत्यु हो गई इनका मकबरा लाहौर में इल्तुतमिश ने बनवाया।
  • चौगान को वर्तमान में “पोलो”कहते हैं।इस खेल का जन्म भारत में हुआ इसका मैदान सभी खेलो में सबसे बड़ा होता है। पोलो में चार व वाटर पोलो में सात खिलाड़ी होती है।

1 .कुत्वत उल इस्लाम मस्जिद :-

  • ऐबक द्वारा दिल्ली में निर्मित यह भारत की प्रथम मस्जिद हैं।
  1. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती:-
  • ये मोहम्मद गोरी के साथ पृथ्वीराज चौहान-lll के शासनकाल में भारत आए। इनकी दरगाह अजमेर में है जिसे दूसरा मक्का कहा जाता हैं।
  • गरीब नवाज के नाम से प्रसिद्ध इन्होंने भारत में चिश्ती संप्रदाय चलाया।
  1. दाई दिन का झोपड़ा :-
  • ऐबक द्वारा अजमेर में निर्मित यह राजस्थान की प्रथम मस्जिद थी। इस स्थान पर पहले अजमेर के चौहान शासक विग्रह राज चतुर्थ निर्मित संस्कृत पाठशाला थी। इतिहास कार सरजान मार्शल के अनुसार इस इमारत का निर्माण ढाई दिन में हुआ। जबकि फर्ग्यूसन के अनुसार यहां मुस्लिम संत पंजाब शाह का ढाई दिन का उर्स भरता है।
  1. कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी :-
  • कुतुबुद्दीन ऐबक के गुरु इन्हीं की याद में दिल्ली के कुतुब- मीनार का निर्माण ऐबक ने प्रारंभ करवाया। जिसे इल्तुतमिश ने पूरा करवाया।
  • इसमें पांच मंजिल है। इसकी ऊंचाई 73 मीटर 238 फीट हैं।यह भारत की सबसे ऊंची मीनार है। बिजली गिरने से इसकी पांचवी मंजिल टूट गई। जिसे फिरोज तुगलक ने पुनः बनवाया। इस इमारत को अंतिम स्वरूप सिकंदर लोदी के शासनकाल में दिया गया था।
  1. बख्तियार खिलजी :-
  • कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनापति जिसने नालंदा व विक्रमशिला विश्वविद्यालय को तुडवाया था।
  • नालंदा विश्वविद्यालय पटना (बिहार) में कुमार गुप्त ने तला विक्रमशिला विश्वविद्यालय भागलपुर (बिहार) में धर्मपाल बनवाई।
  • मोहम्मद गोरी के सेनापति ऐबक को हिंदुस्तान ,यलदोज़ को गौर व कूवाचा को काबुल का क्षेत्र प्राप्त हुआ था।
  1. आराम शाह :-
  • कुतुबुद्दीन ऐबक का अयोग्य पुत्र जो 8 माह भारत का शासक रहा।इसकी राजधानी लाहौर थी।1211ई. के जड़ के युद्ध में इल्तुतमिश ने आराम शाह कि हत्या कर दी और इनका मकबरा लाहौर में बनवाया।

इल्तुतमिश :- [1211-1236]

  • ये इलबरी तुर्क कबिले के सरदार व ऐबक के दामाद व गुलाम थे। इन्हें दिल्ली सल्तनत गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक व गुलामो का गुलाम कहा जाता है।
  • ये अपनी राजधानी लाहौर से दिल्ली लेकर आए। इन्हें इकता प्रथा प्रारंभ कि इन्हें भारत में मकबरा व गुंबर निर्माता के नाम से जाना जाता है।
  • इन्होंने सुल्तान उपाधि ग्रहण कर सुल्तान के पद को वंशानुगत कर दिया। भारत में इस युद्ध में अरबी सिक्के चलाए जिनमें टक्का चांदी से व जीतन तांबा से बना होता था।
  1. तराईन का तॄतीय युद्ध :-
  • यह युद्ध 1215 में इल्तुतमिश व यलदोज के मध्य लड़ा गया इसमें यलदोज़ की हार हो जाती है।

चंगेज खां :-

  • मंगोलिया के इस शासक का वास्तविक नाम तैमुचीन था।यह 1221 में जलालुद्दीन मंगबरनी का पीछा करते हुए भारत आया। लेकिन इल्तुतमिश ने मंगबरनी को गिरफ्तार कर चंगेज खां को सौंप दिया।

तुकांत ए चहलगामी :-

  • इसे दल चालीस भी कहते हैं। यह चालीस गुलामों का एक संगठन था जो शासक की सुरक्षा करता था। इसका निर्माण इल्तुतमिश ने किया। जबकि इसे बलवन ने समाप्ति किया।

सुल्तान गद्दी :-

  • दिल्ली में स्थिति यह इल्तुतमिश के पुत्र नासिरुद्दीन महमूद का मकबरा है। इसे भारत से निर्मित मकबरा माना जाता है। जिसका निर्माण इल्तुतमिश ने करवाया था ।इसी मकबरा के पास इल्तुतमिश ने स्वयं का मकबरा भी बनवाया है।

खालसा भूमि :-

  • वह भूमि जो राजा की नियंत्रण में होती थी।

इकता भूमि :-

  • शासक द्वारा वेतन के बदले सैनिकों को दि गई भूमि इकता कहलाती है।

रुकनुद्दीन फिरोज शाह :-

  • इल्तुतमिश का अयोग्य पुत्र व दिल्ली सल्तनत का एकमात्र शासक जिसे से जनता ने गद्दी से हटाया था।

रजिया सुल्तान :- [1236-1240]

  • यह इल्तुतमिश की पुत्री व गुलाम वंश की महिला थी इन्हें दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली प्रथम व एकमात्र महिला शासिका माना जाता है। ये दरबार में मर्दाना बेस में चोगा (कोट) व कुहाल (टोपी) पहनकर दरबार में आती थी। इन्हें बुर्के का परित्याग करने वाली विश्व की प्रथम महिला माना जाती है।
  • इनके प्रेमी का नाम याकूत तथा पति का नाम अल्तूनिया था।याकूत को रजिया ने अश्वशाला का प्रमुख “अमीर ए अंकुर” के पद पर नियुक्त किया।
  • 13 oct.1240 कैंथल (पंजाब) में डाकूओं से लड़ते हुए रजिया व अल्तूनिया कि मृत्यु हो गई।
  • रजिया सुल्तान का मकबरा कैंथल में स्थित है।

बहराम शाह :- [1240-1242]

अलाउद्दीन मसूद शाह :- [1242-1246]

नासिरुद्दीन महमूद :- [1246-1266]

  • इनके समय सत्ता का वास्तविक बासडोर बलवन के हाथ में थी। ये दिल्ली सल्तनत के ऐसे शासक थे जो टोपी शिखर पर अपना जीवन यापन करते थे।

बलवन :- [1266-1287]

  • ये इलबरीरी तुर्क कबीले के सरदार थे। इन्हें 20 वर्ष का वजीर व 20 वर्ष का शासक कहा जाता है। इन्होंने लोह व रक्त की नीति अपनाई। इसी नीति के अनुसरण आगे चलके जर्मनी के एकीकरण के समय विस्मार्क ने किया था।
  • बलवंत ने दिल्ली में लालगढ़ महल बनवाया और फारसी धर्म का नववर्ष (नवरोज)भारत में बनवाना प्रारम्भ किया। इसके शासक को ईश्वर का रूप बताया तथा दरबार मे सिजदा (सिर झुकाना) व पैबोस (पैर चूमना) प्रथा प्रारंभ की।
  • बलवन ने तुर्कान ए चहलगामी को समाप्त किया। बलवन स्वयं संगठन का सदस्य रहा था। बलवन ने स्थायी सेना रखने का प्रयास किया तथा “दीवान ए अर्ज ” नामक एक सैन्य विभाग बनाया।
  • 1286 में मंगोल आक्रमण को रोकने के लिए बलवन पुत्री शहजाद मोहम्मद को भेजा। जिनकी इस आक्रमण में मृत्यु हो गई।
  • पुत्र वियोग के कारण 1287 में बलवन की भी मृत्यु हो जाती है। बलवन की मृत्यु पर दिल्ली की जनता सडको पर अपने कपड़े फाड़- फाड़ कर रोयी थी।

शमसुद्दीन कर्मूस :-

कैकूबाद :-

  • गुलाम वंश का अंतिम शासक।

साथियों गुलाम वंश के इतिहास से संबंधित जानकारी आपको अच्छी लगी है तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करें आगे भी इसी प्रकार से आपके लिए पोस्ट लाते रहेंगे धन्यवाद !

गुलाम वंश ने कितने वर्ष तक शासन किया?

Gulam vans. इसने दिल्ली की सत्ता पर करीब ८४ वर्षों तक राज किया तथा भारत में इस्लामी शासन की नींव डाली। इससे पूर्व किसी भी मुस्लिम शासक ने भारत में लंबे समय तक प्रभुत्व कायम नहीं किया था। इसी समय चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र पर मंगोलों का आक्रमण भी हुआ।

गुलाम वंश कब से कब तक चला?

दिल्ली पर शासन करने वाले सुल्तान तीन अलग-अलग वंशों के थे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतबी, इल्तुतमिश ने शम्सी व बलबन ने बलबनी वंश की स्थापना की थी। आरम्भ में कुतबी वंश को दास या गुलाम वंश का नाम दिया गया, क्योंकि इस वंश का प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गोरी का गुलाम था।

गुलाम वंश का अंत कैसे हुआ?

मुइज़-उद-दीन मुहम्मद कैकाबाद गुलाम वंश का अंतिम राजा था। वे गयास-उद-दीन बलबन का पोता था जिसने उत्तरी भारत में 1266-1287 तक शासन किया था। खिलजी शासक जलाल उद दीन फिरोज खिलजी द्वारा गुलाम वंश का अंत हुआ और उसके बाद खिलजी वंश की शुरुआत हुई।

गुलाम वंश के बाद कौन सा वंश आया?

ये पाँच वंश थे- गुलाम वंश (1206 - 1290), ख़िलजी वंश (1290- 1320), तुग़लक़ वंश (1320 - 1414), सैयद वंश (1414 - 1451), तथा लोदी वंश (1451 - 1526)।

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