कहानी का पहला तत्त्व कौन है? - kahaanee ka pahala tattv kaun hai?

यह कहानी का न केवल प्राथमिक एवं महत्त्वपूर्ण उपकरण है अपितु कहानी का दर्पण भी है। कहानी अच्छी है अथवा बुरी, इसका बहुत-कुछ अंकन शीर्षक पर भी निर्भर है। भाव अथवा अर्थ-सूचकता के आधार पर शीर्षक के अनेक रूप हो सकते हैं।

कुछ प्रमुख रूप इस प्रकार हैं – (क) स्थान-सूचक (ईदगाह-प्रेमचन्द), (ख) घटना-व्यापारसूचक (पुरस्कार-प्रसाद), (ग) कौतूहलजनक (उसने कहा था-गुलेरी), (घ) व्यंग्यपूर्ण (आदम की डायरी-अज्ञेय), (ङ) अर्थपूर्णता, (च) विषयानुकूलता।

2. कथावस्तु –

यह कहानी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। कहानी के शरीर मेें कथानक हड्डियों के समान है, अतः कथानक या कथावस्तु की रचना अत्यन्त वैज्ञानिक तरीके से क्रमिक विकास के रूप में होनी चाहिये।

एक अच्छे कथानक के लिए चार प्रमुख गुण अपेक्षित हैं – मौलिकता, सम्भाव्यता, सुगठितता एवं रोचकता। मौलिकता से तात्पर्य यहाँ नवीनता से है।

किसी भी अच्छे कथानक की पांच अवस्थाएँ मानी गई हैं – 1. आरम्भ, 2. विकास, 3. मध्य, 4. चरम सीमा तथा, 5. अन्त। इन पांच अवस्थाओं से युक्त कहानी एक सफल कहानी मानी जाती है।

3. चरित्र-चित्रण –

कथावस्तु के बाद चरित्र-चित्रण कहानी का अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। वस्तुतः पात्र कहानी के सजीव संचालक होते हैं। पात्रों के माध्यम से एक ओर कथानक का आरम्भ, विकास और अन्त होता है, तो दूसरी ओर हम कहानी में इनसे आत्मीयता प्राप्त करते हैं।
जहाँ तक पात्रों के चयन का सम्बन्ध है वे सर्वथा सजीव और स्वाभाविक होने चाहिए तथा पात्रों की अवतारणा कल्पना के धरातल से न होकर कहानीकार की आत्मानुभूति के धरातल से होनी चाहिये।

कहानी में पात्रों की भूमिका के आधार पर उन्हें तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है – मुख्य, सहायक एवं खल। इस तरह के वर्गीकरण से कहानी के नायक तथा उसके सहयोगी या विरोधी पात्रों का चरित्रांकन किया जाता है।

पात्रों के स्वभाव, उनके व्यक्तित्व तथा उनकी चिन्तन प्रणाली के आधार पर कई विभाग किये जा सकते हैं, जैसे-आदर्शवादी, यथार्थवादी, व्यक्तिवादी, मनोवैज्ञानिक, प्रतीकात्मक, ऐतिहासिक, पौराणिक आदि।

जहाँ तक चरित्र-चित्रण अथवा पात्र-योजना के गुणों का सम्बन्ध है, उसमें निम्नलिखित गुण अपेक्षित हैं –
अनुकूलता, मौलिकता, स्वाभाविकता, सजीवता, यथार्थता, सहृदयता तथा अन्तर्द्वन्द्वात्मकता।

4. कथोपकथन या संवाद योजना –

कथोपकथन कहानी का महत्त्वपूर्ण अंग है। यदि किसी कहानी में संवाद न होकर केवल वर्णन ही होंगे तो उस कहानी के पात्र अव्यक्त रह जायेंगे तथा प्रभावशीलता एवं संवेदनशीलता नष्ट हो जायेगी, परन्तु यदि केवल संवाद ही होंगे, तो वह कहानी न रह कर एकांकी नाटक बन जायेगी। अतः कहानी में संवाद वर्णन में उचित समन्वय होना चाहिये।

कहानी में कथोपकथन का कार्य कथा को गति प्रदान करना, पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करना, भाषा-शैली का निर्माण करना तथा कथा को रस की स्थिति तक पहुँचाना है।

सफल कथोपकथन वे कहे जायेंगे जो स्वाभाविक एवं परिस्थिति के अनुकूल हों, जिनमें जिज्ञासा एवं कुतूहलता उत्पन्न करने की क्षमता हो। संक्षिप्तता एवं ध्वन्यात्मकता भी कथोपकथन के गुण हैं।

5. भाषा –

भाषा कहानी का पांचवाँ मूल तत्त्व है। भाषा वस्तुतः भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। अतः भाषा के लिए यह आवश्यक है कि वह सहज, सरल एवं बोधगम्य हो। कहानी की भाषा ऐसी होनी चाहिए कि उसमें मूल संवेदना को व्यक्त करने की पूरी क्षमता हो। वह ओज एवं माधुर्य गुणों से युक्त तथा विषयानुकूल हो।

सफल भाषा के गुणों में प्रवाहात्मकता, आलंकारिकता, चित्रात्मकता, प्रतीकात्मकता आदि गुण प्रमुख माने जाते हैं।

6. शैली –

बाबू गुलाबराय के शब्दों में ’’शैली का सम्बन्ध कहानी के किसी एक तत्त्व से नहीं वरन् सब तत्त्वों से है तथा उसकी अच्छाई एवं बुराई का प्रभाव सम्पूर्ण कहानी पर पङता है।’’ कला की प्रेषणीयता प्रमुख रूप से शैली पर ही निर्भर करती है।

वर्तमान समय में कहानी लिखने की प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित हैं-

(1) ऐतिहासिक शैली

(2) आत्मकथात्मक शैली

(3) पत्रात्मक शैली

(4) डायरी शैली

(5) नाटकीय शैली

(6) संवादात्मक शैली

(7) स्वप्न शैली

(8) संस्मरणात्मक शैली

(9) रिपोर्ताज शैली

(10) मनोविश्लेषणात्मक शैली।

एक सफल शैली के लिए ये गुण अपेक्षित माने गये हैं – आलंकारिकता, प्रवाहात्मकता, रोचकता, व्यंग्यात्मकता, भावात्मकता, तथा प्रतीकात्मकता।

7. वातावरण –

कहानी कला का मेरुदण्ड है वास्तविक जीवन। वह वास्तविक जीवन देश, काल, जीवन की विभिन्न सत्-असत् प्रवृत्तियों और परिस्थितियों से निर्मित होता है। इन तत्त्वों को एक साथ एक ही स्थान पर चित्रित करना कहानी में वातावरण उपस्थिति करना है। वातावरण भौतिक तथा मानसिक दोनों प्रकार का हो सकता है। वातावरण कहानी को यथार्थ बनाने में सहायक होता है। अतः कहानी जिस स्थान अथवा समय से सम्बन्धित रहे, उसका यथार्थ चित्रण उसमें होना चाहिए।

8. उद्देश्य –

यह कहानी का अन्तिम तत्त्व है। कोई भी रचना लिखी जाती है, उसका कोई उद्देश्य अवश्य होता है। वह उद्देश्य पाठकों के मनोरंजन से लेकर गम्भीर समस्या का निरूपण तक हो सकता है।

कहानीकार अपनी कहानियों के उद्देश्य अपनी विचारधारा के अनुसार रखते हैं। कहानी में उद्देश्यों की संख्या सीमित नहीं होती है। कुछ प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं- मनोरंजन, उपदेशात्मकता, हास्योत्पादन, आदर्श स्थापना, यथार्थ-चित्रण, सुधार भावना, समस्या-चित्रण, मनोवैज्ञानिक आदि।

मूल्यांकन की दृष्टि से कहानी के कुछ तत्व निर्धारित किये गये हैं। समीक्षकों ने कथा साहित्य के रूप में उपन्यास और कहानी को एक समान मानकर मापदण्ड की एक ही पद्धति अपनाई है, और उपन्यास की भाँति कहानी के भी छः तत्व माने हैं:

 

1 कथानक- कथानक का अर्थ

 

  • कथानक का अर्थ है कहानी में प्रयोग की गई कथावस्तु या वह वस्तु जो कथा में विषय रूप में चुनी गई हो। 
  • कहानी में सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक आदि में से किसी एक विषय को लेकर घटना का विकास किया जाता है। 
  • कथानक में स्वाभाविकता लाने के लिए उसमें यथार्थ, कल्पना, मनोविज्ञान आदि का समावेश यथोचित रूप में किया जाता है। कथानक के विकास की चार स्थितियाँ मानी गई है- आरम्भ, विकास, चरमोत्कर्ष और अन्त । 
  • कहानी का आरम्भ रोचक ढंग से होना चाहिए ताकि पाठक के मन में आगे की घटनाओं के लिए जिज्ञासा उत्पन्न हो सके। जिससे पाठक कहानी में इस कदर डूब जाये कि उसके मन में कहानी को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त करने का लालच आ जाय। 
  • विकास अथवा आरोह में घटना क्रम में सहजता और पात्रों के स्वाभाविक मनः स्थिति का विकास दिखाया जाना चाहिए। जिससे पाठक को कथानक समझने में आसानी एंव संपूर्ण कथानक उसके मन-मस्तिष्क में एक चलचित्र की भाँति चलने लगे। 
  • तीसरी स्थिति चरमोत्कर्ष वह अवस्था है जहाँ पर कहानी की रोचकता में क्षणभर के लिए स्तब्धता आ जाती है। पाठक कहानी का अन्तिम फल जानने के लिए उत्तेजित हो उठता है एंव वह अनायास ही कयास लगाने लगता है। 
  • कहानी के अन्त में परिणाम निहित रहता है, जिससे पाठक को सकून की अनुभूति प्राप्त होती है। 
  • अतः कहानी का उद्देश्य एंव कथानक स्पष्ट होना चाहिए। यह न तो विस्तृत होना चाहिए और न ही बिलकुल संक्षिप्त होना चाहिए।

 

कथानक का उदाहरण 

  • हिमांशु जोशी की कहानी 'तरपन' का कथानक मधुली नामक विधवा स्त्री के घर से प्रारंभ होता है, जिसका पति की सरकारी सुरंग निर्माण के दौरान मृत्यु हो जाती है। उसकी तेरहवीं पर मृतक की आत्मा की शान्ति के लिये तरपन; तर्पणद्ध करने के लिये मधुली के पास धनाभाव होता है जिसके लिये वह दर दर भटकती है। 
  • अंततः वह कोसी के तट पर मिट्टी की गाय बना अपने पति का तर्पण स्वयं करती है। 
  • कहानी का अन्त पाठक की समस्त जिज्ञासुओं को शान्त कर देता है परन्तु बदलते परिवेश एंव लेखन में आये बदलाव में आजकल कुछ कहानीकार परिणाम को अस्पष्ट रखकर पाठको को मनन की स्थिति में छोड़ देते हैं।

 

2 पात्र एवं चरित्र चित्रण

 

  • किसी भी कहानी में कथानक के बाद पात्रों का स्थान महत्वपूर्ण होता है। कहानी में पात्रों की कम संख्या अपेक्षित है। 
  • कथानक को पात्र ही गति देता है अन्यथा कथानक निरर्थक हो जाता है। कहानीकार कथानक के मुख्य भाव को पात्रों के माध्यम से ही प्रस्तुत करता है। 
  • कहानी में मुख्य रूप से तीन प्रकार के पात्र होते हैं मुख्य पात्र, सहायक पात्र एंव गौण पात्र। कहानी वैसे तो मुख्य पात्रों के इर्द-गिर्द घुमती रहती है परन्तु सहायक एंव गौण पात्रों के माध्यम से लेखक कहानी में रोमांच, रहस्य एंव हास्य आदि भावों का पुट देता रहता है। 
  • पात्रों के सटीक चरित्र चित्रण से कहानी ज्यादा मोहक, प्रभावशाली एंव शिक्षाप्रद हो जाती है। 
  • कहानी के मुख्य पात्र समाज के लिए प्रेरणा स्रोत एवं बच्चों के आदर्श बन जाते हैं, तथा वे जीवन में वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं।

 पात्र एवं चरित्र चित्रण का उदाहरण 

  • तरपन कहानी की मुख्य पात्र मधुली है और समस्त कथानक उसके आस पास ही घूमता है। इसके अतिरिक्त कहानी में उसका पति तुलसा, साहुकार कंसा, ब्राह्मण आदि सहायक पात्र हैं जो कहानी को गतिशीलता प्रदान करते हैं।

 

3 कथोपकथन

 

  • कहानी में कथा विकास और चरित्र विकास के लिए कथोपकथन सहायक होते हैं। पात्रों के आपसी संवाद या वार्तालाप को कथोपकथन कहा जाता हैं। 
  • कहानी में कथोपकथन से एक ओर घटनाक्रम को बढ़ाया जाता है तो दूसरी ओर पात्रों की चरित्रगत विशेषताओं को दिखाया जाता है। 
  • संवाद में रोचकता, सजीवता और स्वाभाविकता का गुण आवश्यक होता है। इसके साथ ही संवाद की भाषा पात्रों के अनुकूल, परिवेश के अनुरूप, आकार में छोटे और प्रभावशाली होनी चाहिए। किसी भी कहानी में कथोपकथन उसकी अभिव्यक्ति एंव आम पाठक के बीच पैठ बनाने में सहायक होता है।

 कथोपकथन का उदाहरण 

  • तरपननामक कहानी में पात्रों के संवाद मन को छू लेते हैं। एक जगह मधुली तर्पण करने हेतु आये पंडित से कहती है, "बामणज्यू गरूण पुराण की सामर्थ्य मेरी कहाँ, मेरे पास तो जौं तिल बहाने के पैसे भी नहीं हैं, गौ गारस के लिए आटा नहीं है और बच्चे तीन दिन से भूखे हैं।" ये कथन मानव मन को उद्वेलित कर देते हैं।

 

4 वातावरण

 

  • कहानी को सहज और स्वाभाविक रूप प्रदान करने के लिए उसके वातावरण का विशेष महत्व होता है। 
  • वातावरण से तात्पर्य है कहानी में प्रयोग किये गये विषय-वस्तु के आस पास का परिवेश अर्थात् देश और काल का वर्णन करना। इसमें कहानीकार सामाजिक कहानियों में अपने युग का और ऐतिहासिक पौराणिक कहानियों में पुरातन युग के इतिहास, भूगोल, समाज आदि का चित्रण करते हैं। 
  • कहानी में घटना, स्थान, पात्र, पात्रों की भाषा- वेशभूषा इत्यादि देश और काल के अनुसार ही की जाती है। कहानी जब दृश्य एंव श्रव्य माध्यम से समाज के सामने आती है तो उस देश, काल, परिस्थिति, भाषा-शैली, पहनावा तथा रहन-सहन से सभी परिचित हो जाते हैं। 


  • उदाहरणस्वरूप वर्तमान में अधिकांश धारावाहिकों में राजस्थान का चित्रण किया जा रहा है, इससे पूरा देश वहाँ की संस्कृति से परिचित हो रहा है। साथ ही बाल विवाह जैसी कुप्रथा के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी है।

 

5 भाषा-शैली

 

  • यहाँ आप कहानी में शैलीगत तत्त्व को जानने से पहले शैली के शाब्दिक अर्थ को समझेंगे। शैली का अर्थ है कथन पद्धति। सामान्य अर्थ में कहें तो कहने का एक अंदाज यानि ढंग, तरीका जो उसे दूसरों से भिन्न दिखाये शैली है। 
  • भाषा शैली का सम्बन्ध कहानी के सभी तत्त्वों के साथ रहता है। कहानी की भाषा शैली सरल, सुबोध, सरस और धाराप्रवाह होनी चाहिए। 
  • भाषा शैली में शब्द-चयन, सुसंगठित वाक्य-विन्यास, लक्षणा-व्यंजना आदि का प्रयोग उसकी महत्ता को बढ़ा देता है। कहानी की कई शैलियाँ है, जैसे कहानी में वर्णनात्मकसंवादात्मक, पात्रात्मक, आत्मकथात्मक और डायरी शैली में से किसी एक या एक से अधिक भाषा शैलियों को स्थान दिया जा सकता है।

 

  • कहानी की रचना में भाषा का अत्यंत महत्व होता है कहानी की भाषा सरल, स्पष्ट एंव सुग्राही होनी चाहिए। यदि भाषा अधिक क्लिष्ट होगी तो ना तो यह साधरण पाठक को लुभा पायेगी और ना यह कहानी के उद्देश्य को ग्रहण कर पायेगी। अतः कहानी में भाषा ऐसी हो जो सुग्राही, कथानक एंव पात्रों के अनुरूप हो और जिसका प्रभाव व्यापक एवं गहरा हो।

 

6 उद्देश्य

 

  • प्रायः कहानी का उद्देश्य 'मनोरंजन' माना जाता है, पर विद्वानों के अनुसार कहानी किसी लक्ष्य-विशेष को लेकर चलती है और पाठक को भी वहाँ तक पहुँचा देती है। वस्तुतः कहानी का उद्देश्य यर्थाथ के सुरूचि पूर्ण वर्णन द्वारा उच्च आदर्शों का संदेश देना है। चूँकि कहानी में जीवन की जटिलताओं, दैनन्दिन कार्यकलापों एवं व्यस्तताओं को उद्घाटित किया जाता है। अतः कहानी अपनी संक्षिप्तता और संप्रेषणता के द्वारा मनुष्य को जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करती है।

 

  • कहानी के छः तत्वों को ज्यो-का-त्यों स्वीकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि आजकल कई कहानियों में कथानक का वह स्वरूप नहीं मिलता जो समीक्षकों ने परम्परागत रूप में रखा है। कई कहानियों में संवाद होता ही नहीं है। इसी तरह केवल मनोरंजन के उद्देश्य से ही कई कहानियाँ नहीं लिखी जाती। अब तक कहानी की यात्रा अपने आरम्भ से लगातार परिवर्तनशील रही है। तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उपर्युक्त छः तत्व आज की कहानी के लिए सीमा रेखा नहीं बना सकते। अतः परम्परा से चली आ रही मूल्यांकन दृष्टि को तोड़ना होगा।

 

कथाकार और समीक्षक 'बटरोही' ने कहानी के केवल दो तत्व बताए

  • इन सब कठिनाइयों को देखते हुए कथाकार और समीक्षक 'बटरोही' ने कहानी के केवल दो तत्व बताए- (1) शाब्दिक जीवन प्रतिबिम्ब (2) उससे निःसृत होने वाली 'एक' एवं प्रत्यक्ष’ (मानवीय) संवेदना। वे स्पष्ट करते हैं कि जीवन-प्रतिबिम्ब के अंग के रूप में पात्र और वातावरण आ जाते हैं, उनका आना अनिवार्य हो, ऐसी बात नहीं हैं। 


बहुत बार कहानीकार के अलावा कहानी में कोई दूसरा पात्र नहीं होता। इस विधा के दो निम्नलिखित रचना-तत्व हैं :

 

  • (अ) कथा-तत्व
  • (ब) संरचना तत्व।

 

'कथा- तत्व' से आशय

  • 'कथा- तत्व' से आशय परम्परागत रूप से चला आ रहा 'कथानक' नहीं हैं अपितु जीवन-जगत के प्रतिबिम्बों का कथन और उनका प्रत्यक्षीकरण। घटनाओं, क्रिया-व्यापारों और चरित्रों के माध्यम से किसी एक संवेदना को जगाने के लिए अपनाया गया कथा-परिवेश |

 'संरचना - तत्व' 

  • 'संरचना - तत्व' इस कथन तत्व को या जीवन जगत् के प्रतिबिम्बों को प्रभावशाली ढंग से विन्यासित करने वाले उपादन है, जिसे हम भाषा, सवांद और इनके द्वारा निर्मित वातावरण, शैली आदि के रूप में देख सकते हैं। वस्तुतः ये दोनों तत्व परस्पर घुले-मिले रहते है और कहा को प्रभावशाली बनाने में अपना योगदान देते हैं। संरचना तत्व ही कहानी का रचनात्मक परिवेश

    कहानी का मूल तत्त्व क्या है?

    कहानी के मूलतः छः तत्व हैं। ये हैं- विषयवस्तु अथवा कथानक, चरित्र, संवाद, भाषा शैली, वातावरण और उद्देश्य।

    कहानी का पहला तत्व क्या होता है?

    1 कथानक- कथानक का अर्थ कथानक में स्वाभाविकता लाने के लिए उसमें यथार्थ, कल्पना, मनोविज्ञान आदि का समावेश यथोचित रूप में किया जाता है। कथानक के विकास की चार स्थितियाँ मानी गई है- आरम्भ, विकास, चरमोत्कर्ष और अन्त । कहानी का आरम्भ रोचक ढंग से होना चाहिए ताकि पाठक के मन में आगे की घटनाओं के लिए जिज्ञासा उत्पन्न हो सके।

    कहानी कितने प्रकार के होते हैं?

    कहानी के भेद (प्रकार).
    1 घटनाप्रधान कहानी.
    2 चरित्र प्रधान कहानी.
    3 वातावरण प्रधान कहानी.
    कहानी की ऐतिहासिक शैली-.
    कहानी की आत्मकथात्मक शैली-.
    कहानी की पत्रात्मक शैली-.

    कहानी का कथानक क्या होता है?

    "किसी साहित्यिक कृति (उपन्यास, नाटक, कहानी अथवा कविता) की ऐसी योजना, घटनाओं के पैटर्न अथवा मुख्य कथा को कथानक कहते हैं जिसका निर्माण उद्दिश्ट प्रसंगों की सहेतुक संयोजित शृंखला (स्तरक्रम) के क्रमिक उद्घाटन से किया गया हो।"