दंड से क्या अभिप्राय है इसकी विशेषता क्या है? - dand se kya abhipraay hai isakee visheshata kya hai?

सामाजिक नियंत्रण की अवधारणा सामाजिक विचार सर्वप्रथम अमेरिकन समाजशास्त्रीय ई. ए. राॅस ने सन् 1901 में अपनी पुस्तक Social Control में व्यवस्थित रूप से व्यक्त किए हैं। उस समय से अब तक सामाजिक नियंत्रण की अवधारणा के संबंध में इसी पुस्तक का सहारा लेना पड़ता है। इस पुस्तक में रॉस ने समाज के नियंत्रण कार्य संस्थाओं के में धर्म, विश्वास, जनमत, नैतिकता, कानून, शिक्षा, रीति-रिवाज आदि की भूमिकाओं का वर्णन किया है।

सामाजिक नियंत्रण का अर्थ | Samajik niyantran ka Arth

सामाजिक नियंत्रण का सामान्य धारणा यह है कि लोगों के समूह द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार आचरण करने के लिए बाध्य करना सामाजिक नियंत्रण है, प्रारंभ में सामाजिक नियंत्रण का अर्थ केवल दूसरे समूहों से अपने समूह की रक्षा करना, मुखिया के आदेशों का पालन करना मात्र था। बाद में धार्मिक और नैतिक नियमों के अनुसार व्यवहार करने का सामाजिक नियंत्रण माना गया। किंतु वर्तमान समय में “सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य संपूर्ण समाज व्यवस्था के नियम से लिया जाता है जिसका उद्देश्य सामाजिक आदर्शों एवं उद्देश्यों को प्राप्त करना है।”

सामाजिक नियंत्रण की परिभाषा | Samajik niyantran ki paribhasha

गिलिन तथा गिलिन के अनुसार- “अपने परिवार के साथ सामाजिक नियंत्रण अनेक प्रकार के सुझावों प्रतिरोध उत्पीड़न तथा बल प्रयोग जैसे साधनों की व्यवस्था है जिसके द्वारा समूह अपने सदस्यों के व्यवहार को सामाजिक प्रति मानव के अनुरूप बनाने का प्रयत्न करता है।”

रॉस के ‌ अनुसार - “सामाजिक नियंत्रण का तात्पर्य उन तमाम व्यक्तियों से है, जिसके द्वारा समुदाय व्यक्तियों को अपने अनुसार ढालता है।”

सामाजिक नियंत्रण के कार्य | सामाजिक नियंत्रण के उद्देश्य

  1. सामाजिक नियंत्रण का प्रमुख कार्य एवं उद्देश्य समाज में सुख एवं शांति की स्थापना करना है।
  2. समाज में व्यक्तियों की स्थिति का निर्धारण करना।
  3. सामाजिक व्यवहार में समानता लाना।
  4. व्यक्ति के व्यवहारों को नियंत्रित करना।
  5. समाज के सदस्यों में एकता की भावना उत्पन्न करना।
  6. समाज के सभी सदस्यों को अधिकतम सुरक्षा प्रदान करना।
  7. समुदाय द्वारा स्वीकृत मूल्यों व्यवहार प्रतिमानों को सदस्यों के समक्ष रखना तथा उनके अनुरूप कार्य करने के लिए उन्हें प्रेरित करना।
  8. समूह के उद्देश्यों को प्राप्त करना।
  9. सभी सदस्यों तथा समूह के समक्ष विकास के लिए एक सुव्यवस्थित संगठित परिस्थिति प्रस्तुत करना।
  10. सामाजिक नियंत्रण के कार्य किसी विशेष समूह अथवा समाज में एकता और गतिशीलता लाना है।
  11. सामाजिक नियंत्रण के उद्देश्य लोगों के विचारों और कार्यों में संतुलन स्थापित करना है।

सामाजिक नियंत्रण की अवधारणा | samajik niyantran ki avdharna

सभी समाज अपने सदस्यों से अपेक्षा करता है कि वह उनकी संस्कृति के अनुसार प्रतिमानों, प्रथाओं, रीति-रिवाजों, मूल्यों, आदर्शों एवं कानूनों के अनुसार आचरण कर समाज को स्थायित्व प्रदान करें। इसलिए वह अपने सदस्यों पर कुछ नियंत्रण लगाता है। सामाजिक नियंत्रण वह विधि है जिसके द्वारा एक समाज अपने सदस्यों के व्यवहारों का नियम बनाता है। उनकी निर्धारित भूमिकाएं निभाने नियमों का पालन करने एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए लोगों को प्रेरित करता है। समाज में जब नई परिस्थितियां उत्पन्न होती है तब भी समाज अपने सदस्यों पर अंकुश लगाता है। जिससे कि नई परिस्थितियों से प्रभावित होकर लोग सामाजिक ढांचे को तोड़ ना दे। सामाजिक नियंत्रण एक अन्य दृष्टि से भी आवश्यक है- मानव अपनी प्रकृति से ही स्वार्थी, व्यक्तिवादी, लड़ाकू, हिंसक एवं संघर्षकारी है। यदि उनकी इन प्रवृत्तियों पर रोक नहीं लगाया जाए और उन्हें पूरी तरह स्वच्छंद छोड़ दिया जाए तो समाज युद्ध स्थल बन जाएगा और मानव का जीना कठिन हो जाएगा। सामाजिक नियंत्रण के अभाव में मानवीय संबंधों की व्यवस्था एवं संपूर्ण मानव जीवन ही अस्त-व्यस्त हो जाएगा। समाज का निर्माण ही सामाजिक संबंधों एवं नियंत्रण की व्यवस्था द्वारा होता है, एक ही अनुपस्थिति में दूसरे का अस्तित्व कदापि सुरक्षित नहीं है।

सामाजिक नियंत्रण के प्रकार | samajik niyantran ke prakar

1. सत्तावादी लोकतांत्रिक एवं प्रजातांत्रिक नियंत्रण- लेपियर‌ सामाजिक नियंत्रण को सत्तावादी एवं लोकतांत्रिक दो भागों में बांटा है। लीपियर कहते हैं कि जब कभी कोई प्रशासनिक संस्था दंड देने वाले व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत संगठनों के अतिरिक्त किसी दूसरे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शक्ति का प्रयोग करता है तभी इस प्रकार से स्थापित किए गए नियंत्रण को सत्तावादी नियंत्रण कहते हैं। लोकतांत्रिक नियंत्रण में व्यक्तियों को संतुष्ट करने के लिए आपसी वार्तालाप किया जाता है। सत्तावादी नियंत्रण में धमकी एवं शारीरिक उत्पीड़न का सहारा लिया जाता है जबकि लोकतांत्रिक नियंत्रण में व्यक्तियों को पुरस्कार एवं भावात्मक प्रेरणा के द्वारा नियंत्रण में रखा जाता है।

2. सकारात्मक और नकारात्मक नियंत्रण- सामाजिक नियंत्रण मैं व्यक्ति को पुरस्कार देकर सही व्यवहार करने के लिए प्रेरित किया जाता है। उदाहरण के लिए अच्छे आचरण वाले छात्र को, श्रेष्ठ छात्र को, श्रेष्ठ खिलाड़ी को, वीर सिपाही को, पुरस्कार, शाबाशी आदि देना सकारात्मक नियंत्रण है। नकारात्मक नियंत्रण में समाज विरोधी व्यवहार करने वाले व्यक्तियों को दंडित किया जाता है। दंड की मात्रा कितनी होगी यह इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति ने कितना गंभीर अपराध किया है। दंड में बहिष्कार, जेल, जुर्माना और मृत्यु दंड आदि कई प्रकार की हो सकती है।

3. चेतना और अचेतन नियंत्रण- कुछ व्यवहार ऐसे हैं जिनके प्रति हम अधिक सचेत होते हैं और यह ध्यान करते हैं कि उनको निभाने में कोई गलतियां ना हो जाए उदाहरण के लिए, एक क्लर्क ऑफिस में अपने बॉस की कुर्सी पर नहीं बैठता है, लेकिन उन्हें कुर्सियों पर बैठता है जो क्लर्कों के लिए है। इस प्रकार वह इस स्थिति को समझ कर कार्य करता है। और दूसरा अचेतन इनका पालन करने के लिए हमें अधिक सोचना नहीं पड़ता वरुण हम स्वता ही वैसा आचरण करने लगते हैं। उदाहरण के लिए वस्त्र पहनते समय हमें जिस वस्त्र को जहां धारण करना है वही पहनते हैं बनियान को कोर्ट पर धारण नहीं करते। यह सब कुछ अचेतन रूप से ही होता है क्योंकि वर्षों से एक निश्चित प्रकार का आचरण करने के कारण हम वैसे ही करने लगते हैं।

4. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नियंत्रण- प्रत्यक्ष नियंत्रण का तात्पर्य ऐसे नियंत्रण से है जो व्यक्ति पर उसके बहुत समीप के व्यक्तियों पर द्वारा लागू किया जाता है, उदाहरण के लिए माता-पिता मित्रों गुरुजनों अथवा पड़ोसियों द्वारा किया जाने वाला नियंत्रण। यह नियंत्रण प्रशंसा आलोचना सम्मान या पुरस्कार के रूप में किया जाता है। इस प्रकार के नियंत्रण का प्रभाव गहरा एवं स्थाई होता है। क्योंकि यह व्यक्ति के समाजीकरण के माध्यम होते हैं। व्यक्ति के शेष सामाजिक व भौतिक पर्यावरण तथा विभिन्न समूहों एवं संस्थाओं द्वारा लागू किया जाने वाला नियंत्रण प्रत्यक्ष नियंत्रण कहलाता है। नियंत्रण का यह स्वरूप अत्यधिक सूचना और छोटे-छोटे व्यवहारों को नियंत्रित करने वाला होता है।

5. संगठित और असंगठित- संगठित नियंत्रण का अर्थ पूर्ण नियंत्रण से है जो अनेक छोटी-बड़ी एजेंसियों और व्यापक नियमों द्वारा व्यक्तियों के व्यवहारों को प्रभावित करता है इसका विकास नियंत्रित रूप से होता है। इसमें व्यक्तियों के कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जा सकता है, शिक्षण संस्था परिवार राज्य बैंक आदि लागू किए गए नियंत्रण इसी श्रेणी में आते हैं। असंगठित नियंत्रण में सांस्कृतिक एवं नियम आते हैं। दैनिक जीवन में इनका प्रभाव सबसे अधिक होता है। संस्कारों, परंपराओं, राजनीतियों द्वारा किया जाने वाला नियंत्रण इसी प्रकार का है।

सामाजिक नियंत्रण का महत्व | samajik niyantran ki visheshta

1. सामाजिक सुरक्षा- समाज में प्रत्येक सदस्य को समाज मैं कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों के द्वारा ही सभी सदस्यों का विकास होता है। यदि सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था ना हो तो शक्तिशाली व्यक्ति दूसरे के अधिकारों का अपहरण कर सकता है। कानून व प्रथाओं के द्वारा सामाजिक नियंत्रण की स्थापना करके सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था की जा सकती है।

2. परंपराओं की रक्षा- प्रत्येक समाज की अपनी कुछ परंपराएं होती है। यह परंपराएं समाज के लिए उपयोगी होती है। सामाजिक नियंत्रण ही एकमात्र ऐसी विधि है जिसके द्वारा इन परंपराओं को उपयोगी बनाया जा सकता है। नियंत्रण के अभाव में सभी व्यक्ति मनमाने ढंग से कार्य करने लगेंगे और समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी।

3. व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण- सामाजिक नियंत्रण के साधनों द्वारा व्यक्ति का व्यवहार समाज के अनुकूल बनाया जा सकता है। व्यक्ति पर परिवार प्रथम रीति-रिवाजों आदि का दबाव होता है। इसलिए सामाजिक नियंत्रण व्यक्ति के व्यवहार पर नियंत्रण रखने के लिए अनिवार्य हैं।

4. व्यक्ति के समाजीकरण के लिए- सामाजिक नियंत्रण के द्वारा व्यक्ति के सामाजिक कार्य में सहायक मिलती है क्योंकि व्यक्ति को इस प्रकार की सत्ता का अनुभव होता है।

5. भावनाओं की समानता- सामाजिक विविधता के लिए समाज के सदस्यों में उनकी भावनाओं में समानता होना आवश्यक है। भावनाओं की एकता से सामाजिक एकता स्थापित की जा सकती है। सामाजिक नियंत्रण के कारण ही व्यक्ति सामान्य ढंग से व्यवहार करते हैं। इस कारण समाज के सदस्यों का व्यवहार एक समान रहता है।

6. सामाजिक स्वीकृति की प्राप्ति- समाज में अनेक प्रकार की प्रथाएं परंपराएं रीति रिवाज आदि अनेक बातें हैं जिसका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। समाज में इन सबका पालन कराने का कार्य सामाजिक नियंत्रण के साधनों का काम है। इस प्रकार सामाजिक नियंत्रण के साधनों द्वारा ही व्यक्ति को समाज के रीति-रिवाजों को स्वीकार करने पर विवश किया जाता है।

7. सामाजिक संगठन में स्थिरता- सामाजिक नियंत्रण से समाज में संगठन बना रहता है। सामाजिक नियंत्रण समाज के सदस्यों को कुछ आदर्शों को स्वीकार करने व्यवहारों के मापदंडों के अनुसार कार्य करने समूह की प्रथाओं रीति-रिवाजों और रूढ़ियों का पालन करने अच्छे आचरण करने आदि के लिए बाध्य करता है। इसके फलस्वरूप सामाजिक जीवन सुख संगठित और दृढ़ होता है।

8. सामाजिक संघर्ष को कम करना- समाज में प्रत्येक व्यक्ति का एक पद होता है तथा व्यक्ति को अपने पद के अनुरूप की भूमिका निभानी पड़ती है। व्यक्ति जब अपने पद के अनुरूप भूमिका निभाता है तो सामाजिक संघर्ष की संभावना कम हो जाती है और उनमें सहयोगात्मक प्रवृत्ति का विकास होता है। सामाजिक नियंत्रण के विभिन्न साधन एवं संस्थाएं सामाजिक संघर्षों कम करते हैं और अपने पद के अनुरूप भूमिका करने के लिए प्रेरित करते हैं।

9. सामाजिक अनिश्चितता को कम करता है- समाज परिवर्तनशील है परंतु यह परिवर्तन ऐसे अनिश्चित नहीं होने चाहिए जो सामाजिक बंधनों को इस सीमा तक प्रभावित करें कि समाज की स्थिरता भंग हो जाए। समझ गई नियंत्रण सदस्यों के सामाजिक जीवन की अनिश्चितता को कम करता है फल स्वरुप समाज में स्थिरता बनी रहती है।

10. विचारों और कार्यों में संतुलन- जिस समाज में व्यक्तियों के विचार और कार्यों में समानता नहीं होती वहां का संगठन धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। सामाजिक नियंत्रण में विचारों व कार्यों का संतुलन बनाने के लिए नियम बनाए जाते हैं। प्राचीन रूढ़ियों में परिवर्तन होता रहता है, किंतु यदि इस परिवर्तन के अनुसार कार्य ना हो तो समाज में अव्यवस्था उत्पन्न हो जाती है। इस अव्यवस्था की दशा को रोकने के लिए सामाजिक नियंत्रण के नियम बनाए जाते हैं, इसलिए विचारों व कार्यों का संतुलन बनाए रखने के लिए सामाजिक नियंत्रण आवश्यक है।

सामाजिक नियंत्रण के अभिकरण | Samajik niyantran ke abhikaran

1. शिक्षण संस्थाएं- शिक्षण संस्थाएं व्यक्ति के आंतरिक व बाह्य दोनों पक्षों को नियंत्रित करती है इन संस्थाओं में व्यक्ति जीवन का वह भाग व्यतीत करता है, जो सबसे अधिक तनावपूर्ण होता है। इस काल का नियंत्रण संपूर्ण जीवन को नियंत्रित रखने और संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण करने में बहुत महत्वपूर्ण होता है। शिक्षण संस्थाओं के नियम व्यक्तित्व के बाहरी पक्ष को प्रभावित करते हैं। जबकि इन संस्थाओं से प्राप्त होने वाला ज्ञान व्यक्तित्व के आंतरिक पक्ष को नियंत्रित व्यवहार परिणामों को समझने लगता है। इस प्रकार व्यक्ति को समाज विरोधी मनोवृति का सामाजिकरण होने लगता है।

2. धर्म- धर्म कुछ अलौकिक शक्तियों में विश्वास और ईश्वरीय सत्ता पर आधारित एक शक्ति है जो नियमों का पालन व्यक्ति पाप और पुण्य अथवा ईश्वरीय शक्ति के भय के कारण करता है। इस शक्ति को सामान्य रूप से अनेक देवी-देवताओं, स्वर्ग और नर्क ईश्वरीय न्याय तथा कर्म और पुनर्जन्म जैसे अनेक धारणाओं के रूप में देखने को मिलती है। व्यक्ति यह विश्वास करते हैं कि धर्म के आदेशों और निर्देशों का पालन न करने पर वह पाप है और इनके अनुसार कार्य करना पुण्य है। पाप का फल ईश्वर यह दंड अथवा नर्क है, जबकि पुण्य से परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है। धर्म बहुत सी रोचक घटनाओं, पौराणिक कथाओं, ईश्वरी महिमा, कर्मकांड और पवित्र वस्तुओं के माध्यम से अविश्वास दिखाता है, कि धार्मिक नियमों का पालन व्यक्ति को कितना समृद्ध सुखी और सफल बना सकता है।

3. नेता तथा नेतृत्व- महान नेताओं के विचार समाज को नियंत्रित रखने में सदैव से ही महत्वपूर्ण रहे हैं। मनोविज्ञान इस कथन की पुष्टि करता है कि सामाजिक नियंत्रण के लिए उचित नेतृत्व एक महत्वपूर्ण साधन है। समाज के अधिकांश सदस्यों में स्वयं विचार करने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। वे केवल दूसरों का अनुसरण ही करते हैं। ऐसी स्थिति में यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि उचित नेतृत्व के द्वारा उनके व्यवहारों पर नियंत्रण रखा जाए और उन्हें एक विशेष प्रकार से कार्य करने का निर्देश दिया जाए। यही कारण है कि जिस समाज में नेतृत्व संगठित होता है वहां व्यक्तियों का जीवन उतना ही अधिक नियंत्रित बना रहता है।

4. प्रथाएं- हम उन सभी आदर्श नियमों को सम्मिलित करते हैं जिनके अनुसार व्यक्ति एक लंबे समय से व्यवहार करते आ रहे हैं। यह आवश्यक नहीं कि सभी प्रथाएं उचित ही हो लेकिन तब भी सभी व्यक्ति इनका पालन करते हैं, क्योंकि इनका संबंध समाज की परंपराओं और संस्कृति विरासत से जोड़ लिया जाता है। प्रथाओं की अधिकार सकती इतनी अधिक होती है कि व्यक्ति बिना समझे ही इन्हें स्वीकार कर लेता है। प्रथाओं का प्रभाव शिक्षित समाज में अपेक्षाकृत कम होता है। क्योंकि प्रथाएं तर्क के स्पष्ट सिद्धांतों पर आधारित नहीं होती है।

5. नैतिकता- इसका संबंध एक ऐसी स्थिति से है, जो व्यक्ति को चरित्रिक नियमों के अनुसार कार्य करने और मानवीय मूल्यों को बनाए रखने की प्रेरणा देती है। नैतिकता के सिद्धांतों का पालन इसलिए नहीं किया जाता कि वे परंपरागत हैं, बल्कि व्यक्ति इन के अनुसार व्यवहार इसलिए करते हैं कि वह न्याय पवित्रता और सत्यता पर आधारित होते हैं। इनका पालन करने के लिए राज्य की ओर से कोई स्पष्ट नियम नहीं बनाए जाते लेकिन व्यक्ति आत्म चेतना के कारण इनका पालन करते रहते हैं।

6. परिवार- सामाजिक नियंत्रण में परिवार सबसे महत्वपूर्ण अभिकरण है। परिवार आरंभिक जीवन से ही बच्चे को अपनी संस्कृति से संबंधित व्यवहार के धार्मिक नियमों जन रिक्तियों, लोकाचारों और प्रथाओं की शिक्षा देता है। समाज की नैतिकता से परिचित करता है समय-समय पर अनजाने में भी भूल हो जाने पर उससे प्रायश्चित कराता है तथा अनेक पुरानी गाथाओं और अनुष्ठानों के द्वारा धार्मिक विश्वासों को दृढ़ बनाता है। यह सर्वविदित है, कि अपने परिवार के सदस्यों द्वारा होने वाली आलोचना दाखवा तिरस्कार व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा दंड है, जिससे बचने के लिए व्यक्ति आरंभिक जीवन से ही सामाजिक नियमों के अनुसार अपने व्यवहारों पर नियंत्रण रखने लगता है।

7. राज्य के कानून- जो प्रशासन कानून सेना पुलिस और न्यायालयों के द्वारा व्यक्ति व समूह को व्यवहारों पर औपचारिक रूप से स्थापना करती है, और राज्य का कार्य अपने सभी नागरिकों के अधिकारों के कर्तव्यों को स्पष्ट करना नीतियों का निर्धारण करना दंड व्यवस्था को लागू करना कल्याणकारी कानून बनाना और उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा करना सामाजिक नियंत्रण का कर्तव्य है।

8. खेल की साथी- आरंभिक जीवन का अनुशासन जीवन पर्यंत व्यक्ति के व्यवहारों को प्रभावित करता है। इस अनुशासन को बच्चा अपने खेल के साथियों के बीच सीखना आरंभ करता है। खेल के साथियों के विचार और व्यवहार बच्चे की आदतों का निर्माण करते हैं। साथियों के साथ खेलते समय एक बच्चा कभी हारता है तो कभी जीतता है। हारने की दशा में बच्चा सहनशक्ति और धैर्य के रूप में जिस अनुसंधान को सीखता है वह धीरे-धीरे उसे अपने नैतिक दायित्व को बोध कराने लगता है।

दण्ड से क्या अभिप्राय है इसकी विशेषताएँ क्या हैं?

दंड का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना होता है । प्राचीन काल में अपराधी को दंड देने का मुख्य उद्देश्य समाज के अन्य व्यक्तियों को भयभीत करना होता था जिससे समाज में शांति बनी रहे जबकि वर्तमान में दंड का मुख्य उद्देश्य अपराधी को सुधारना है ।

दंड से आप क्या समझते हैं?

राजा, राज्य और छत्र की शक्ति और संप्रभुता का द्योतक और किसी अपराधी को उसके अपराध के निमित्त दी गयी सजा को दण्ड कहते हैं। एक दूसरे सन्दर्भ में, राजनीतिशास्त्र के चार उपायों - साम, दाम, दंड और भेद में एक उपाय। दण्ड का शाब्दिक अर्थ 'डण्डा' (छड़ी) है जिससे किसी को पीटा जाता है।

दंड क्या है इसके प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिए?

दण्ड के प्रकार साधारण कारावास एवंम् कठिन कारावास मे अन्तर- जो व्यक्ति कारागार मे साधारण कारावास की सजा भुगत रहा है, वह व्यक्ति को कार्य का चुनाव स्वंय मिलता है, लेकिन जिसे कठिन कारावास की सजा प्राप्त हुयी है, वह व्यक्ति न्यायालय से प्राप्त कार्य के अनुसार ही कार्य कर सकेगा, जबकि मजदूरी दोनो को सजा पूर्ण होने पर मिलेगी।

दंड के कितने सिद्धांत हैं?

दंड के सिद्धान्त (Theories of Punishment) अतः किसी व्यक्ति ने जिस अनुपात में कोई अपराध किया है तो उसे उसी अनुपात में प्रतिक्रिया होती है। अतः किसी व्यक्ति ने जिस अनुपात में कोई अपराध किया है तो उसे उसी अनुपात में दंडित करना प्रतिकारवाद है। ऽ दंड के सुधारवादी सिद्धान्त के अनुसार दंड का लक्ष्य अपराधी को शिक्षित करना है।